Business
Invetech & MeMed win 2026 Good Design Award Gold for MeMed Key™
October 9, 2026
2,539 views
श्रीमती सीता देवी के पुत्र अनूप दुबोलिया की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को बिजली खरीद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने रेलवे की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने खुद को ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ बताते हुए क्रॉस सब्सिडी सरचार्ज (सीएसएस) और अतिरिक्त सरचार्ज (एएस) से छूट मांगी थी। रेलवे का तर्क था कि बिजली अधिनियम-2003 के तहत उसे ऐसी श्रेणी में माना जाए, जिसे बिजली वितरण लाइसेंसधारी जैसी छूट मिलती है। लेकिन कोर्ट ने अपीलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी के फैसले को बरकरार रखते हुए रेलवे की अपील खारिज कर दी। अदालत ने माना कि रेलवे अपने नेटवर्क का उपयोग मुख्य रूप से खुद की खपत और ट्रैक्शन जरूरतों के लिए कर रहा है, न कि आम उपभोक्ताओं को बिजली वितरण के लिए। इसलिए उसे सामान्य ओपन एक्सेस उपभोक्ता माना जाएगा। अन्य बड़े उपभोक्ताओं की तरह सीएसएस व अतिरिक्त सरचार्ज देना होगा। क्या होता है सीएसएस और अतिरिक्त सरचार्ज? बिजली मामलों के जानकार और रिटायर्ड एडिशनल चीफ इंजीनियर राजेंद्र अग्रवाल के मुताबिक घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत सस्ती बिजली उपलब्ध कराने के लिए उद्योगों और बड़े उपभोक्ताओं से अतिरिक्त राशि ली जाती है। इसे ही क्रॉस सब्सिडी सरचार्ज कहा जाता है। जब कोई बड़ा उपभोक्ता डिस्कॉम से बिजली लेने की बजाय खुले बाजार से सस्ती बिजली खरीदता है, तब वितरण कंपनियों को राजस्व नुकसान होता है। इसी नुकसान की भरपाई सीएसएस के जरिए की जाती है। अतिरिक्त सरचार्ज का उद्देश्य बिजली व्यवस्था बनाए रखने की लागत की भरपाई करना होता है। अकेले मप्र को हर माह 50 करोड़ चुकाने होंगे फैसले का असर मप्र समेत उन राज्यों पर पड़ेगा, जहां रेलवे लंबे समय से राज्य की बिजली वितरण कंपनियों से बिजली लेने की बजाय खुले बाजार से बिजली खरीद रहा था। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक अकेले मप्र में यह देनदारी हर महीने करीब 50 करोड़ रु. तक पहुंच सकती है।