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April 4, 2026
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अमेरिका-इस्राइल के ईरान पर हमले का असर, निर्यातकों की बढ़ी टेंशन; यूपी से 9000 करोड़ का होता है निर्यात
ईरान पर अमेरिका-इज़राइल का जवाबी हमला: उत्तर प्रदेश के निर्यातकों पर मंडराए 9,000 करोड़ रुपये के व्यापारिक संकट के बादल
वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा असर, हस्तशिल्प उद्योग के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिन्ह
परिचय
वैश्विक मंच पर, विशेष रूप से मध्य पूर्व में, भू-राजनीतिक तनावों का बढ़ना हमेशा से ही विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर अप्रत्याशित और अक्सर नकारात्मक प्रभाव डालता रहा है। हाल ही में, ईरान पर अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए संभावित जवाबी हमलों ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को हिलाकर रख दिया है, बल्कि इसके दूरगामी आर्थिक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। भारत, अपनी वैश्विक व्यापारिक भागीदारी के साथ, इस तनाव से अछूता नहीं रह सकता। विशेष रूप से, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य, जहाँ हस्तशिल्प उद्योग निर्यात का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, इस संकट की पहली कतार में खड़े हैं। यह लेख ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के हमलों के संभावित प्रभावों का एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के निर्यातकों के सामने उत्पन्न 9,000 करोड़ रुपये के व्यापारिक संकट पर ध्यान केंद्रित करता है, और कैसे यह वैश्विक अस्थिरता हमारे स्थानीय उद्योगों को प्रभावित कर सकती है।
गहन पृष्ठभूमि और संदर्भ
हालिया घटनाक्रम ईरान और इज़राइल के बीच वर्षों से चले आ रहे तनाव का एक चरमोत्कर्ष है। यह तनाव कई मोर्चों पर फैला हुआ है, जिसमें क्षेत्रीय प्रभाव, परमाणु कार्यक्रम और प्रॉक्सी युद्ध शामिल हैं। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, जिसे कई देश अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं, इस पूरे विवाद का एक प्रमुख बिंदु रहा है। इज़राइल, विशेष रूप से, ईरान को एक गंभीर अस्तित्वगत खतरे के रूप में देखता है और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है।
अमेरिका, इज़राइल का सबसे मजबूत सहयोगी होने के नाते, इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति और हितों की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहा है। इस जटिल समीकरण में, हालिया घटनाओं ने सीधे तौर पर सैन्य हस्तक्षेप की ओर इशारा किया है, जिसने वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता दोनों के लिए गंभीर चिंताएं पैदा की हैं।
ईरान और वैश्विक अर्थव्यवस्था:
ईरान, अपने विशाल तेल भंडार के साथ, वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी है। इसके अलावा, यह मध्य पूर्व में एक प्रमुख शक्ति है, जिसके क्षेत्रीय गतिशीलता पर महत्वपूर्ण प्रभाव हैं। किसी भी सैन्य संघर्ष या उस पर लगाए गए कठोर प्रतिबंधों का सीधा असर कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों पर पड़ता है, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति बढ़ सकती है और आर्थिक विकास धीमा हो सकता है।
अमेरिका-इज़राइल की भूमिका:
अमेरिका और इज़राइल, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर अपनी चिंताओं को खुलकर व्यक्त करते रहे हैं। इज़राइल की प्रतिक्रियाएं अक्सर अधिक प्रत्यक्ष और तत्काल होती हैं, जबकि अमेरिका की नीतियां थोड़ी अधिक राजनयिक और प्रतिबंधों पर केंद्रित रही हैं। हालांकि, हालिया घटनाएं एक ऐसे बिंदु पर पहुंची हैं जहाँ सीधे सैन्य कार्रवाई की संभावना प्रबल हो गई है।
भारत और उत्तर प्रदेश का निर्यात:
भारत, एक प्रमुख वैश्विक व्यापारिक देश के रूप में, ईरान के साथ अपने व्यापारिक संबंधों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से इन भू-राजनीतिक तनावों से प्रभावित होता है। उत्तर प्रदेश, अपने समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योगों के लिए प्रसिद्ध है, भारत के निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इनमें लकड़ी के खिलौने, कालीन, चमड़े के उत्पाद, पीतल के बर्तन और मिट्टी के बर्तन जैसे उत्पाद शामिल हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में काफी मांग है।
उत्तर प्रदेश के निर्यात की विशिष्टता:
उत्तर प्रदेश का निर्यात केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह राज्य की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक शिल्प कौशल का प्रतिनिधित्व भी करता है। हजारों कारीगर और लघु उद्यमी इस उद्योग से जुड़े हुए हैं, और उनका जीवनयापन सीधे तौर पर निर्यात की मांग पर निर्भर करता है। जब यह मांग बाधित होती है, तो यह न केवल अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है, बल्कि कारीगरों के जीवन और उनकी पीढ़ियों से चली आ रही कला को भी खतरे में डालता है।
बहुआयामी विश्लेषण: यह क्यों मायने रखता है?
ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के हमलों का प्रभाव केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसके दूरगामी आर्थिक और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं, जिनमें से एक उत्तर प्रदेश के निर्यातकों के लिए 9,000 करोड़ रुपये के व्यापारिक संकट का उभरना है। यह विश्लेषण इस संकट के विभिन्न पहलुओं और इसके निहितार्थों को उजागर करेगा।
1. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर प्रभाव:
* तेल की कीमतों में वृद्धि: मध्य पूर्व क्षेत्र कच्चे तेल का एक प्रमुख उत्पादक है। किसी भी सैन्य संघर्ष से तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है। यह वृद्धि न केवल परिवहन लागत को बढ़ाएगी, बल्कि विनिर्माण लागत पर भी असर डालेगी, जिससे अंततः उत्तर प्रदेश से निर्यात किए जाने वाले उत्पादों की अंतिम लागत बढ़ जाएगी।
* शिपिंग और लॉजिस्टिक्स की बाधाएँ: यदि संघर्ष मध्य पूर्व के महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों को प्रभावित करता है, तो माल के परिवहन में देरी और व्यवधान हो सकते हैं। यह उन निर्यातों को विशेष रूप से प्रभावित करेगा जो समुद्री मार्ग से भेजे जाते हैं, जिससे डिलीवरी के समय बढ़ेंगे और ग्राहकों को असंतोष का सामना करना पड़ सकता है।
* कच्चे माल की उपलब्धता: कई भारतीय निर्यात, विशेष रूप से हस्तशिल्प, विशिष्ट प्रकार के कच्चे माल पर निर्भर करते हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से या सीधे तौर पर वैश्विक बाजारों से आयात किए जाते हैं। यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित होती हैं, तो इन कच्चे मालों की उपलब्धता और कीमत दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
2. मांग में कमी और बाजार का संकुचन:
* आर्थिक मंदी का डर: भू-राजनीतिक अस्थिरता अक्सर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता को जन्म देती है। जब अर्थव्यवस्थाएं मंदी की आशंका का सामना करती हैं, तो उपभोक्ता अपने गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करते हैं। हस्तशिल्प उत्पाद, अपनी विशिष्टता और लागत के कारण, अक्सर ऐसे खर्चों की श्रेणी में आते हैं। इससे उत्तर प्रदेश से निर्यात होने वाले उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग में कमी आ सकती है।
* यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों पर निर्भरता: उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प उत्पादों के प्रमुख खरीदार अक्सर यूरोपीय संघ और उत्तरी अमेरिका के विकसित देश होते हैं। यदि इन क्षेत्रों में आर्थिक मंदी आती है या उपभोक्ता खर्च कम होता है, तो इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश के निर्यात पर पड़ेगा।
* प्रतिस्पर्धा में वृद्धि: वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में, अन्य देश अपने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए आक्रामक कदम उठा सकते हैं, जिससे उत्तर प्रदेश के निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है।
3. विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प उद्योग पर प्रभाव:
* उच्च मूल्य और विशिष्टता: उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प उत्पाद अपनी अनूठी डिजाइन, पारंपरिक शिल्प कौशल और उच्च गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। ये उत्पाद अक्सर महंगे होते हैं और इनकी मांग इन विशेषताओं से प्रभावित होती है। वैश्विक मंदी या अस्थिरता के समय, ऐसे उत्पादों की मांग सबसे पहले प्रभावित होती है।
* लघु और मध्यम उद्यमों (SMEs) की भेद्यता: उत्तर प्रदेश का हस्तशिल्प उद्योग मुख्य रूप से लघु और मध्यम उद्यमों (SMEs) द्वारा संचालित होता है। इन उद्यमों के पास बड़े निगमों की तरह वित्तीय लचीलापन या संसाधनों की कमी होती है। वैश्विक झटकों को झेलने की उनकी क्षमता कम होती है, जिससे वे संकट के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
* रोजगार पर असर: हजारों कारीगर और श्रमिक सीधे तौर पर हस्तशिल्प उद्योग से जुड़े हुए हैं। निर्यात में कमी से इन श्रमिकों की आय प्रभावित होगी, जिससे गरीबी बढ़ सकती है और सामाजिक अस्थिरता का खतरा पैदा हो सकता है।
4. 9,000 करोड़ रुपये के व्यापारिक संकट का तात्पर्य:
यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प उद्योग के वार्षिक निर्यात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दर्शाता है। यदि वैश्विक परिस्थितियां बिगड़ती हैं और निर्यात में उल्लेखनीय गिरावट आती है, तो यह आंकड़ा वास्तविक नुकसान का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यह न केवल निर्यातकों के लिए वित्तीय झटका होगा, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय निर्यात लक्ष्य को भी प्रभावित करेगा।
स्टेकहोल्डर्स (हितधारक) शामिल:
* उत्तर प्रदेश के निर्यातक और कारीगर: वे सीधे तौर पर सबसे अधिक प्रभावित होंगे। उनकी आजीविका और व्यवसायों पर तत्काल असर पड़ेगा।
* राज्य सरकार (उत्तर प्रदेश): निर्यात को बढ़ावा देने और कारीगरों के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए नीतियां बनाने और लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर है।
* केंद्र सरकार (भारत): वैश्विक व्यापार नीतियों, कूटनीतिक संबंधों और निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
* अंतर्राष्ट्रीय खरीदार और आयातक: वे वैश्विक अनिश्चितता के कारण खरीददारी के फैसले बदल सकते हैं।
* बैंक और वित्तीय संस्थान: निर्यातकों को ऋण और अन्य वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं, और संकट के समय उनकी वसूली भी प्रभावित हो सकती है।
* अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और भू-राजनीतिक विश्लेषक: वे स्थिति की निगरानी करेंगे और उसके अनुरूप अपनी नीतियों को समायोजित करेंगे।
कालानुक्रमिक घटनाएँ या विस्तृत विवरण (संभावित परिदृश्य)
यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह संकट अभी एक संभावित खतरा है, न कि एक पूर्ण वास्तविकता। हालांकि, ऐतिहासिक घटनाओं और वर्तमान भू-राजनीतिक गतिशीलता के आधार पर, हम एक संभावित कालानुक्रमिक परिदृश्य बना सकते हैं कि यह संकट कैसे विकसित हो सकता है:
1. आरंभिक तनाव और मीडिया कवरेज (वर्तमान):
* ईरान और इज़राइल के बीच तनाव बढ़ता है।
* अंतर्राष्ट्रीय मीडिया इस मुद्दे को प्रमुखता से कवर करता है।
* निवेशक और व्यापारी अनिश्चितता के कारण सतर्क हो जाते हैं।
* तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि शुरू हो सकती है।
2. सीधा सैन्य हस्तक्षेप (संभावित):
* ईरान या इज़राइल द्वारा सीधा हमला किया जाता है।
* क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों में वृद्धि होती है।
* तत्काल प्रभाव:
* तेल की कीमतों में भारी उछाल: वैश्विक तेल आपूर्ति पर चिंता बढ़ जाती है।
* वित्तीय बाजारों में गिरावट: शेयर बाजार में गिरावट आ सकती है।
* सुरक्षा चिंताएं: यात्रा और परिवहन पर प्रतिबंधों की आशंका।
3. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और प्रतिबंध (संभावित):
* संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतर्राष्ट्रीय निकाय मध्यस्थता का प्रयास कर सकते हैं।
* अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान पर नए प्रतिबंध लगा सकते हैं।
* आर्थिक परिणाम:
* ईरान से व्यापार पर सीधा असर: यदि भारत का ईरान से सीधा व्यापार है, तो वह प्रभावित होगा।
* वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा: ईरान से संबंधित किसी भी उत्पाद या कच्चे माल के आयात-निर्यात में दिक्कतें।
* प्रतिबंधों का अप्रत्यक्ष प्रभाव: यदि ईरान के साथ व्यापार करने वाले अन्य देश प्रतिबंधों का सामना करते हैं, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से भारत को भी प्रभावित कर सकता है।
4. वैश्विक मांग में कमी और निर्यात पर प्रभाव (कुछ महीनों के भीतर):
* वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता बढ़ने के कारण उपभोक्ता खर्च में कमी आती है।
* उत्तर प्रदेश के निर्यातकों पर प्रभाव:
* ऑर्डर में कमी: अंतर्राष्ट्रीय खरीदार नए ऑर्डर कम कर देते हैं या मौजूदा ऑर्डर रद्द कर देते हैं।
* भुगतान में देरी: खरीदार भुगतान करने में देरी कर सकते हैं।
* उत्पाद लागत में वृद्धि: बढ़ी हुई परिवहन लागत और कच्चे माल की कीमतों के कारण उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
* कीमतों में प्रतिस्पर्धा: मांग कम होने से कीमतें कम रखने का दबाव बढ़ जाता है, जो मार्जिन को कम कर देता है।
* 9,000 करोड़ रुपये के संकट का वास्तविक रूप लेना: निर्यात आय में 10-20% या उससे अधिक की गिरावट देखी जा सकती है, जो इस आंकड़े को सीधे प्रभावित करेगी।
5. लघु और मध्यम उद्यमों पर गंभीर प्रभाव:
* नकद प्रवाह की समस्या।
* श्रमिकों को छंटनी का सामना करना पड़ सकता है।
* कई छोटे व्यवसाय बंद होने के कगार पर पहुंच सकते हैं।
6. सरकार की प्रतिक्रिया (लंबी अवधि):
* निर्यातकों को राहत पैकेज।
* नए बाजारों की तलाश।
* प्रोत्साहन योजनाओं को मजबूत करना।
* कौशल विकास और उन्नयन पर जोर।
भविष्य का दृष्टिकोण और निहितार्थ
ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के हमलों का प्रभाव एक जटिल और बहुआयामी परिदृश्य प्रस्तुत करता है, जिसके दूरगामी निहितार्थ हैं। उत्तर प्रदेश के निर्यातकों के लिए 9,000 करोड़ रुपये का संकट केवल एक संख्या नहीं है; यह हजारों परिवारों की आजीविका, सदियों पुरानी कलात्मक परंपराओं और राज्य की आर्थिक स्थिरता का प्रतिनिधित्व करता है।
1. आर्थिक निहितार्थ:
* निर्यात आय में गिरावट: सबसे प्रत्यक्ष परिणाम निर्यात आय में गिरावट होगी। उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प उद्योग की कुल निर्यात आय पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, जिससे सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) पर भी असर पड़ सकता है।
* रोजगार का नुकसान: हस्तशिल्प उद्योग एक श्रम-गहन क्षेत्र है। मांग में कमी से बड़े पैमाने पर छंटनी हो सकती है, जिससे बेरोजगारी दर बढ़ सकती है।
* लघु उद्योगों का पतन: लघु और मध्यम उद्यम (SMEs), जो इस उद्योग की रीढ़ हैं, वित्तीय दबाव का सामना करेंगे। कई व्यवसाय बंद हो सकते हैं, जिससे उनकी विशेषज्ञता और उत्पादन क्षमता का नुकसान होगा।
* अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों पर असर: यदि संकट लंबा खिंचता है, तो यह भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है, खासकर यदि भारत की स्थिति को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में मतभेद हों।
* आर्थिक अनिश्चितता का चक्र: वैश्विक अनिश्चितता का माहौल घरेलू निवेश को भी हतोत्साहित कर सकता है, जिससे आर्थिक विकास धीमा हो सकता है।
2. सामाजिक निहितार्थ:
* गरीबी में वृद्धि: निर्यातकों और कारीगरों की आय में कमी से गरीबी का स्तर बढ़ सकता है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां हस्तशिल्प उद्योग प्रमुख है।
* सामाजिक असंतोष: आर्थिक कठिनाइयों से सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है, जिससे कानून और व्यवस्था की स्थिति पर भी असर पड़ सकता है।
* कला और शिल्प का क्षरण: यदि कारीगरों को अपनी कला से उचित आय नहीं मिलती है, तो वे इस पेशे को छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इससे सदियों पुरानी कलात्मक परंपराओं का क्षरण हो सकता है और उनका ज्ञान अगली पीढ़ियों तक नहीं पहुंच पाएगा।
* शहरीकरण और पलायन: ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी से शहरों की ओर पलायन बढ़ सकता है, जिससे शहरी अवसंरचना पर दबाव बढ़ेगा।
3. सरकारी और नीतिगत प्रतिक्रिया की आवश्यकता:
* विविधीकरण: निर्यात बाजारों का विविधीकरण एक महत्वपूर्ण रणनीति है। उन नए बाजारों की पहचान करना और उन तक पहुंचना जहां भू-राजनीतिक तनाव का प्रभाव कम हो।
* प्रोत्साहन और सहायता: सरकार को निर्यातकों के लिए विशेष प्रोत्साहन पैकेज, जैसे रियायती ऋण, कर छूट और बीमा योजनाओं की पेशकश करनी चाहिए।
* कौशल विकास और उन्नयन: कारीगरों को नई तकनीकों और डिजाइन में प्रशिक्षित करना ताकि वे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर सकें।
* सीधी बाजार पहुंच: अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों और भारतीय निर्यातकों के बीच सीधी बातचीत के लिए मंच तैयार करना।
* व्यापार समझौतों को मजबूत करना: उन देशों के साथ मौजूदा व्यापार समझौतों को मजबूत करना जो इस क्षेत्र से भौगोलिक रूप से दूर हैं।
* आंतरिक आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना: स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने और आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक लचीला बनाने के प्रयास।
* जोखिम प्रबंधन: निर्यातकों को मुद्रा में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक जोखिमों के खिलाफ बचाव के लिए उपकरण प्रदान करना।
4. अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का महत्व:
* भारत को ईरान और अमेरिका-इज़राइल दोनों के साथ अपने कूटनीतिक संबंध बनाए रखने और संतुलित करने होंगे।
* शांतिपूर्ण समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाना।
निष्कर्ष
ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के हमलों का संभावित प्रभाव, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के 9,000 करोड़ रुपये के निर्यात संकट के रूप में, एक गंभीर चेतावनी है। यह दर्शाता है कि कैसे वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं हमारे स्थानीय उद्योगों और हजारों लोगों की आजीविका को सीधे प्रभावित कर सकती हैं। यह संकट केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है।
उत्तर प्रदेश के निर्यातकों के सामने खड़ी यह चुनौती केवल उनकी नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक लचीलेपन और वैश्विक कूटनीति की प्रभावशीलता का भी परीक्षण है। इस संकट से निपटने के लिए एक बहुआयामी, समन्वित और सक्रिय दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें सरकार, उद्योग और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय सभी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। समय रहते उचित कदम न उठाए गए, तो यह संकट एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक तबाही का कारण बन सकता है। यह एक ऐसा क्षण है जब हमें न केवल वर्तमान चुनौतियों का सामना करना होगा, बल्कि भविष्य के लिए एक अधिक लचीली और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण भी करना होगा।