Politics

\'90% हिंदू मछली-मीट खाते हैं\', AIMIM के दिल्ली चीफ ने कहा- होली में लंबी लंबी लाइन लगती है

February 25, 2026 788 views 1 min read
\'90% हिंदू मछली-मीट खाते हैं\', AIMIM के दिल्ली चीफ ने कहा- होली में लंबी लंबी लाइन लगती है
90% हिंदू मछली-मीट खाते हैं: AIMIM दिल्ली चीफ का दावा, बिहार के मीट बैन पर गरमाई सियासत

परिचय

बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने हाल ही में एक ऐसा फैसला लिया है जिसने राज्य की राजनीतिक फिजाओं को गरमा दिया है। शिक्षण संस्थानों और धार्मिक स्थलों के आसपास मीट-मछली की दुकानों पर प्रतिबंध लगाने के इस निर्णय ने जहाँ एक ओर सामाजिक सद्भाव और स्वास्थ्य को लेकर बहस छेड़ दी है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों के बीच तीखी नोकझोंक का माहौल भी पैदा कर दिया है। इस फैसले के समर्थन और विरोध में तरह-तरह के तर्क दिए जा रहे हैं, और इसी बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष, श्री जसवंत सिंह, का एक बयान इस बहस को एक नया आयाम दे रहा है। उनका दावा है कि \"90% हिंदू मछली-मीट खाते हैं\" और होली जैसे त्योहारों पर भी इन दुकानों पर लंबी कतारें लगती हैं। यह बयान न केवल बिहार सरकार के फैसले को चुनौती देता है, बल्कि भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने और खाद्य आदतों पर भी महत्वपूर्ण प्रश्नचिन्ह लगाता है। इस विस्तृत लेख में, हम बिहार सरकार के इस फैसले की पृष्ठभूमि, इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं, AIMIM नेता के बयान के निहितार्थ, और इस मुद्दे पर विभिन्न समुदायों और राजनीतिक दलों के रुख का गहन विश्लेषण करेंगे।

पृष्ठभूमि और संदर्भ: क्यों लगाया गया यह प्रतिबंध?

बिहार सरकार का यह निर्णय कोई अचानक लिया गया कदम नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई वर्षों से चली आ रही विभिन्न शिकायतें और चिंताएं रही हैं। विशेष रूप से, सार्वजनिक स्थानों पर, खासकर स्कूलों और धार्मिक स्थलों के पास, मीट-मछली की दुकानों के संचालन को लेकर चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। इसके कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:

* सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता: कई बार यह देखा गया है कि इन दुकानों से निकलने वाला अपशिष्ट पदार्थ (waste) उचित तरीके से प्रबंधित नहीं किया जाता, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है। गंदगी, मक्खियों और मच्छरों का पनपना, और दुर्गंध जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं, जो विशेष रूप से बच्चों और धार्मिक स्थलों पर आने वाले लोगों के लिए परेशानी का सबब बनती हैं।
* धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता: धार्मिक स्थलों के आसपास, जहाँ शांति और पवित्रता का माहौल अपेक्षित होता है, मीट-मछली की दुकानों के खुले संचालन को कुछ समुदायों द्वारा आपत्तिजनक माना जाता है। यह धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है और धार्मिक स्थलों की गरिमा को कम कर सकता है।
* बच्चों पर प्रभाव: स्कूलों के पास ऐसी दुकानों के होने से बच्चों के मन में मांस-मछली के सेवन को लेकर विभिन्न प्रकार के विचार उत्पन्न हो सकते हैं। कुछ का मानना है कि यह बच्चों के पोषण संबंधी आदतों को प्रभावित कर सकता है या उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे व्यवसायों की ओर आकर्षित कर सकता है जो शायद सभी के लिए उपयुक्त न हों।
* भोजन की आदतों पर सरकारी नियंत्रण की बहस: इस प्रतिबंध को कुछ लोग सरकार द्वारा व्यक्तिगत भोजन की आदतों पर अनावश्यक हस्तक्षेप के रूप में भी देख रहे हैं। यह बहस का एक महत्वपूर्ण बिंदु है कि क्या सरकार को नागरिकों के खान-पान की आदतों को नियंत्रित करने का अधिकार है, खासकर जब वे सार्वजनिक व्यवस्था या स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित न कर रहे हों।

हालांकि, सरकार का कहना है कि यह निर्णय मुख्य रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और धार्मिक स्थलों की पवित्रता बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया है। इस फैसले के कार्यान्वयन में कितनी सख्ती बरती जाएगी और इसके परिणाम क्या होंगे, यह देखना अभी बाकी है।

AIMIM नेता का बयान: 90% हिंदू मछली-मीट खाते हैं

AIMIM के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष, श्री जसवंत सिंह, का बयान इस पूरे मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ है। उनका यह दावा कि \"90% हिंदू मछली-मीट खाते हैं\" और \"होली में लंबी लंबी लाइन लगती है\" कई स्तरों पर चर्चा को जन्म देता है:

* आहार संबंधी डेटा का अभाव: श्री सिंह का यह आँकड़ा किस आधार पर है, यह स्पष्ट नहीं है। भारत में, विशेष रूप से हिंदुओं के बीच, शाकाहार का प्रचलन काफी अधिक है। जबकि मांसाहार, जिसमें मछली और मांस दोनों शामिल हैं, की भी एक बड़ी आबादी है, 90% का आँकड़ा विवादास्पद है और इसके पुख्ता साक्ष्य की आवश्यकता है। यह संभव है कि उनका तात्पर्य \"खाते हैं\" से यह हो कि वे इन उत्पादों का सेवन करते हैं, न कि प्रतिदिन या प्रमुख भोजन के रूप में।
* सांस्कृतिक और क्षेत्रीय भिन्नताएँ: भारत में भोजन की आदतें अत्यंत विविध हैं। दक्षिण भारत, पूर्वी भारत और तटीय क्षेत्रों में मछली का सेवन व्यापक है, जबकि अन्य क्षेत्रों में यह उतना आम नहीं हो सकता है। इसी तरह, मांस (जैसे चिकन, मटन) का सेवन भी विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों में भिन्न होता है।
* त्योहारों और अवसर: श्री सिंह ने होली का उल्लेख किया है। यह सच है कि कई त्योहारों और सामाजिक समारोहों के अवसर पर मांसाहार का सेवन बढ़ जाता है, चाहे वह किसी भी समुदाय का हो। यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक प्रथा का हिस्सा हो सकता है।
* AIMIM का राजनीतिक रुख: AIMIM एक मुस्लिम-केंद्रित पार्टी के रूप में जानी जाती है। इस बयान के माध्यम से, पार्टी संभवतः उन समुदायों को संबोधित करने की कोशिश कर रही है जो मांसाहार का सेवन करते हैं और जो इस प्रतिबंध से प्रभावित हो सकते हैं। यह सरकार के फैसले के खिलाफ एक राजनीतिक चाल हो सकती है, जिसका उद्देश्य मुस्लिम और अन्य मांसाहारी समुदायों के समर्थन को मजबूत करना है।

श्री सिंह का बयान इस बहस को धार्मिक रंग देने का प्रयास भी करता है, यह दर्शाने की कोशिश में कि यह प्रतिबंध किसी एक समुदाय को लक्षित करने के बजाय, एक व्यापक जनसमूह की आदतों को प्रभावित कर रहा है।

बहुआयामी विश्लेषण: क्यों यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण है?

बिहार सरकार का यह फैसला और उस पर AIMIM नेता का बयान केवल भोजन की आदतों या दुकानों के स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक निहितार्थ हैं।

1. हितधारक (Stakeholders):

* सरकार (बिहार सरकार): निर्णय लेने वाली संस्था। इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और धार्मिक संस्थानों की पवित्रता बनाए रखना है।
* मीट-मछली विक्रेता: इस प्रतिबंध से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले व्यवसाय। उन्हें अपनी दुकानों को स्थानांतरित करना पड़ सकता है या व्यवसाय बंद करना पड़ सकता है।
* जनता (नागरिक):
* उपभोक्ता: जो मीट-मछली खरीदते हैं। उनकी सुविधा और पहुंच प्रभावित हो सकती है।
* धार्मिक स्थल के आसपास रहने वाले/आने वाले: जिन्हें स्वच्छता और शांति की अपेक्षा है।
* छात्र और शिक्षण संस्थानों से जुड़े लोग: जिनके स्वास्थ्य और वातावरण पर संभावित प्रभाव पड़ सकता है।
* धार्मिक संगठन: विभिन्न समुदायों के धार्मिक नेता जो इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं।
* राजनीतिक दल: जैसे AIMIM, जो इस मुद्दे का उपयोग अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कर सकते हैं।
* स्वास्थ्य और पर्यावरण कार्यकर्ता: जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय मुद्दों को उठाते हैं।
* पशु अधिकार कार्यकर्ता: जो मांस के उत्पादन और उपभोग से जुड़े नैतिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

2. क्यों यह महत्वपूर्ण है?

* धार्मिक सहिष्णुता और समावेशिता: क्या ऐसे प्रतिबंध किसी विशेष समुदाय की संस्कृति या आहार को अप्रत्यक्ष रूप से निशाना बना रहे हैं? यह भारत की बहुलवादी प्रकृति के लिए एक चुनौती है।
* आर्थिक प्रभाव: कई छोटे व्यवसायी इन दुकानों पर निर्भर करते हैं। उनके लिए यह एक बड़ा झटका हो सकता है, जिससे गरीबी और बेरोजगारी बढ़ सकती है।
* व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक हित: सरकार को नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (जैसे खान-पान की स्वतंत्रता) और सार्वजनिक हित (स्वास्थ्य, स्वच्छता) के बीच संतुलन बनाना होता है।
* राजनीतिक ध्रुवीकरण: इस तरह के मुद्दे अक्सर राजनीतिक दलों द्वारा वोटों के बंटवारे या एक विशेष समुदाय के समर्थन को मजबूत करने के लिए भुनाए जाते हैं, जिससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।
* भोजन की आदतों का मानकीकरण: क्या सरकार विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों की विविध भोजन आदतों को मानकीकृत करने का प्रयास कर रही है?
* कानूनी और संवैधानिक पहलू: क्या ऐसे प्रतिबंध भारतीय संविधान के तहत नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं?

विस्तृत घटनाक्रम या विश्लेषण: समयरेखा और विभिन्न दृष्टिकोण

यह समझने के लिए कि यह मुद्दा किस दिशा में बढ़ रहा है, हमें इसके घटनाक्रम और विभिन्न दृष्टिकोणों को विस्तार से देखना होगा:

1. प्रतिबंध का प्रस्ताव और निर्णय:

* संभावित पूर्व शिकायतें: यह माना जा सकता है कि वर्षों से विभिन्न स्थानों पर, विशेष रूप से शिक्षण संस्थानों और धार्मिक स्थलों के पास, मीट-मछली की दुकानों से उत्पन्न होने वाली समस्याओं (जैसे गंदगी, बदबू, अतिक्रमण) को लेकर स्थानीय प्रशासन और सरकार को शिकायतें मिलती रही होंगी।
* नीतीश कुमार सरकार की पहल: बिहार में सुशासन (Good Governance) और विकास पर जोर देने वाली सरकार ने अक्सर इस तरह के मुद्दों पर कार्रवाई की है। यह संभव है कि यह निर्णय इन शिकायतों की प्रतिक्रिया में और राज्य को \"स्वच्छ\" और \"संस्कारी\" छवि देने की कोशिश के तहत लिया गया हो।
* आधिकारिक अधिसूचना: सरकार द्वारा इस फैसले की आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई होगी, जिसमें प्रतिबंध के दायरे (कौन से शिक्षण संस्थान, कौन से धार्मिक स्थल) और कार्यान्वयन की प्रक्रिया का उल्लेख होगा।

2. प्रारंभिक प्रतिक्रियाएँ और विरोध:

* मुस्लिम संगठनों का विरोध: यह स्वाभाविक था कि मुस्लिम समुदाय के संगठन, जिनके व्यवसाय और आहार की आदतें अक्सर मीट-मछली से जुड़ी होती हैं, इस फैसले का विरोध करें। उनका तर्क हो सकता है कि:
* यह निर्णय इस्लामी संस्कृति और खान-पान की आदतों पर हमला है।
* यह केवल मुस्लिम विक्रेताओं को लक्षित कर रहा है, क्योंकि ऐसे अधिकांश व्यवसायी अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं।
* कानून सबके लिए समान होना चाहिए; यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है, तो सभी प्रकार की खाद्य दुकानों (मिठाई की दुकानें, होटल आदि) के लिए समान नियम लागू होने चाहिए।
* होली जैसे त्योहारों पर मांसाहार का सेवन बढ़ जाता है, और इस समय प्रतिबंध अनुचित है।
* अन्य समुदायों की चिंताएं: कुछ अन्य मांसाहारी समुदायों के लोग भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं, भले ही उनका प्रतिनिधित्व मुख्य रूप से मुस्लिम संगठनों द्वारा न किया जाए।

3. AIMIM के नेता का बयान और उसका प्रभाव:

* राजनीतिक लाभ की तलाश: AIMIM, अपनी चुनावी रणनीति के तहत, हमेशा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए मुखर रही है। श्री जसवंत सिंह का बयान इस दिशा में एक रणनीतिक कदम हो सकता है।
* \'90% हिंदू\' दावे का विश्लेषण:
* डेटा की कमी: जैसा कि पहले उल्लेख किया गया, यह दावा विवादास्पद है। भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSSO) या अन्य सरकारी एजेंसियों द्वारा किए गए पोषण और आहार संबंधी सर्वेक्षणों में हिंदुओं के बीच शाकाहार के उच्च प्रतिशत का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के लिए, NSSO 2014 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में लगभग 23% लोग मांसाहारी थे, और हिंदुओं में यह प्रतिशत इससे भी कम था। इसलिए, 90% का आंकड़ा शायद ही विश्वसनीय हो।
* \'खाते हैं\' का विस्तार: श्री सिंह का मतलब यह हो सकता है कि बहुत बड़ी संख्या में हिंदू, विशेष अवसरों या नियमित रूप से, मछली और कुछ प्रकार के मांस का सेवन करते हैं। यह सत्य हो सकता है, खासकर पूर्वी और दक्षिणी भारत में।
* होली का संदर्भ: यह कहना कि होली पर इन दुकानों पर लंबी कतारें लगती हैं, यह दर्शाने का एक प्रयास है कि यह प्रथा केवल एक विशेष समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा है।
* बयान का प्रभाव:
* बहस का रुख बदलना: इस बयान ने बहस को केवल मुस्लिम संगठनों के विरोध से आगे बढ़कर, व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में ला दिया।
* अन्य समुदायों को जोड़ना: यदि श्री सिंह का दावा आंशिक रूप से भी सच है, तो यह अन्य समुदायों को भी इस मुद्दे से जोड़ने का एक तरीका हो सकता है, यह कहते हुए कि यह सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए है जो मांसाहार का सेवन करते हैं।
* BJP और अन्य दलों की प्रतिक्रिया: सत्तारूढ़ दल (BJP) और उसके सहयोगी इस बयान को \"ध्रुवीकरण\" के प्रयास के रूप में खारिज कर सकते हैं और अपनी \"सबका साथ, सबका विकास\" नीति पर जोर दे सकते हैं।

4. विभिन्न समूहों के तर्क और प्रतिक्रियाएँ:

* समर्थकों के तर्क:
* \"सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता सर्वोपरि है।\"
* \"धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखना आवश्यक है।\"
* \"बच्चों को हानिकारक वातावरण से बचाना सरकार का कर्तव्य है।\"
* \"यदि ये व्यवसाय नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो उन पर कार्रवाई होनी चाहिए, भले ही वे कहीं भी हों।\"
* विरोधियों के तर्क (AIMIM के बयान के संदर्भ में):
* \"यह प्रतिबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है।\"
* \"यह सरकार द्वारा खाद्य आदतों में हस्तक्षेप है।\"
* \"यह फैसला उन व्यवसायों को बर्बाद कर देगा जो गरीब लोगों की आजीविका का साधन हैं।\"
* \"सांस्कृतिक विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए।\"
* \"क्या सरकार \'हिंदुओं के 90% मछली-मीट खाने\' के दावे को स्वीकार करती है? यदि हाँ, तो यह प्रतिबंध क्यों?\"

5. कार्यान्वयन और संभावित चुनौतियाँ:

* वैकल्पिक स्थानों की उपलब्धता: क्या सरकार प्रभावित विक्रेताओं को स्थानांतरित करने के लिए वैकल्पिक, उपयुक्त स्थान प्रदान करेगी?
* प्रवर्तन में असमानता: क्या यह प्रतिबंध सभी पर समान रूप से लागू होगा, या इसमें भेदभाव होगा?
* भ्रष्टाचार की संभावना: क्या यह नियमों को लागू करने की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को जन्म देगा?
* जनता का प्रतिरोध: क्या स्थानीय लोग ऐसे प्रतिबंधों को स्वीकार करेंगे, या विरोध प्रदर्शन होंगे?

भविष्य का दृष्टिकोण और निहितार्थ

बिहार सरकार का यह मीट-मछली प्रतिबंध का फैसला और उस पर AIMIM के नेता का बयान, भारत के भविष्य के लिए कई महत्वपूर्ण निहितार्थ रखता है:

* खाद्य नीतियों का भविष्य: क्या यह अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल बन सकता है? यदि हाँ, तो यह पूरे देश में खाद्य आदतों और व्यवसायों को कैसे प्रभावित करेगा?
* धार्मिक और सांस्कृतिक सहिष्णुता की परीक्षा: इस मुद्दे पर बहस से पता चलता है कि भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक सहिष्णुता कितनी मजबूत है। क्या हम विभिन्न समुदायों की आहार संबंधी आदतों का सम्मान करना जारी रखेंगे, या उन्हें मानकीकृत करने का दबाव बढ़ेगा?
* राजनीतिकरण का बढ़ता स्तर: यह संभावना है कि भविष्य में भी ऐसे मुद्दों का राजनीतिकरण जारी रहेगा, जिससे सामाजिक विभाजन और बढ़ सकता है।
* सबका साथ, सबका विकास का वास्तविक अर्थ: केंद्र और राज्य सरकारों को यह साबित करना होगा कि उनकी नीतियाँ वास्तव में सभी समुदायों के कल्याण के लिए हैं, न कि किसी एक वर्ग को लक्षित करने के लिए।
* मीडिया की भूमिका: मीडिया इन बहसों को कैसे प्रस्तुत करता है, यह जनता की राय को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। क्या मीडिया तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पर ध्यान केंद्रित करेगा, या सनसनीखेज बयानों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करेगा?
* आर्थिक अनिश्चितता: मीट-मछली व्यापार में लगे लाखों लोगों के लिए, यह अनिश्चितता का समय है। उन्हें अपने व्यवसाय को बचाने या नए अवसरों की तलाश करने के लिए तैयार रहना होगा।

AIMIM के बयान के विशेष निहितार्थ:

* अल्पसंख्यक जुड़ाव: AIMIM ने खुद को उन समुदायों के रक्षक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है जो महसूस करते हैं कि उन पर हमला हो रहा है।
* सेंसरशिप का सवाल: यदि सरकार व्यक्तिगत खान-पान की आदतों को नियंत्रित करने लगती है, तो यह सेंसरशिप की ओर एक कदम के रूप में देखा जा सकता है।
* शाकाहार बनाम मांसाहार की बहस: यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से भारत में शाकाहार और मांसाहार के बीच चल रही बहस को भी हवा देता है।

निष्कर्ष

बिहार सरकार का शिक्षण संस्थानों और धार्मिक स्थलों के पास मीट-मछली की दुकानों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला एक जटिल मुद्दा है जिसके कई पहलू हैं। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, धार्मिक संवेदनशीलता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की एक कोशिश है। हालांकि, इस फैसले के साथ ही AIMIM के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष, श्री जसवंत सिंह, का \"90% हिंदू मछली-मीट खाते हैं\" वाला बयान इस बहस को एक नई दिशा दे रहा है। यह बयान, भले ही विवादास्पद हो, भारत की खाद्य आदतों की विविधता और सांस्कृतिक जटिलताओं को उजागर करता है, और सरकार के फैसले पर सवाल उठाता है।

इस मुद्दे पर आगे की दिशा कई कारकों पर निर्भर करेगी: सरकार प्रतिबंध को कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती है, क्या वह प्रभावित व्यवसायों के लिए कोई राहत प्रदान करती है, और क्या राजनीतिक दल इस मुद्दे का उपयोग समाज को विभाजित करने के बजाय, एक समावेशी समाधान खोजने के लिए करते हैं। भारत की बहुलवादी प्रकृति को बनाए रखने के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि ऐसे निर्णय निष्पक्षता, डेटा-संचालित विश्लेषण और सभी समुदायों की भावनाओं के सम्मान के साथ लिए जाएं। AIMIM नेता का बयान, अपने दावों और निहितार्थों के साथ, इस महत्वपूर्ण बहस में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो हमें याद दिलाता है कि भारत के खाद्य परिदृश्य की गहराई और विविधता को समझना कितना आवश्यक है। भविष्य में, यह देखना होगा कि क्या यह प्रतिबंध एक सकारात्मक बदलाव लाता है, या यह केवल एक और राजनीतिक विवाद का कारण बनता है।