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नवरात्रि पर भक्ति का केंद्र बनीं चांगभखार रियासत की कुलदेवी

October 20, 2026 2,595 views 1 min read
नवरात्रि पर भक्ति का केंद्र बनीं चांगभखार रियासत की कुलदेवी

नवरात्रि पर भक्ति का केंद्र बनीं चांगभखार रियासत की कुलदेवी


शारदीय नवरात्रि के अवसर पर मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भ रतपुर (एमसीबी) जिले के भरतपुर विकासखंड स्थित भगवानपुर गांव में स्थापित मां चांग देवी मंदिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है। जनकपुर से महज 7 किलोमीटर दूर स्थित यह प्राचीन मंदिर क्षेत्र में अगाध आस्था और सामाजिक सौहार्द का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि मां चांग देवी के दरबार में सच्चे दिल से आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूर्ण होती है। यही वजह है कि नवरात्रि के पावन पर्व पर छत्तीसगढ़ के कोने-कोने के अलावा पड़ोसी राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश से भी हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन और आशीर्वाद पाने पहुंच रहे हैं। पूरे मंदिर परिसर में भक्तिमय माहौल है और इस बार कलश कक्ष में कुल मिलाकर 300 से अधिक मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित किए गए हैं, जिनमें 208 घी के दीये तथा 101 तेल के दीये निरंतर जल रहे हैं। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां की गंगा-जमुनी तहजीब है। इस पवित्र स्थान पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग समान रूप से माथा टेकते हैं। स्थानीय मुस्लिम परिवार भी मां चांग देवी को अपनी क्षेत्रीय आराध्य देवी मानते हैं। चांग माता की प्रतिमा। कलश कक्ष में जल रहे 309 दीपक। मां चांग देवी मंदिर का इतिहास और मान्यताएं इतिहास और स्थापना: चांगभखार और कोरिया रियासत की कुलदेवी के रूप में पूजित यह मंदिर चौहान वंश के शासनकाल से जुड़ा है। सरगुजा संभाग के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार, चांगभखार रियासत के राजा मानसिंह ने यहां माता की प्रतिमा स्थापित की थी। मान्यता है कि राजा मानसिंह की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें प्रकट होकर विजय का वरदान दिया था, जिसके बाद से इन्हें &039;&039;चांग देवी&039;&039; नाम मिला। बलि प्रथा पर पूरी तरह प्रतिबंध मंदिर में पहले बकरे की बलि देने की परंपरा थी, जिसे चांगभखार समिति के अध्यक्ष प्रभात सिंह के अनुसार अब पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। कसही पेड़ से मंदिर तक... प्राचीन लोककथा के अनुसार, पिंडी रूप में चांग माता और शिला रूप में झगराखांड माता एक कसही पेड़ के नीचे विराजमान थीं। बाद में भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर दोनों की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। गर्भगृह में कुल चार मूर्तियां स्थापित हैं, जिनमें चांग माता व झगराखांड माता की मूर्तियां सबसे पुरानी हैं। पारंपरिक प्रतिमा के स्थान पर स्थित पत्थर की शिला कलचुरी शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।