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August 25, 2026
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AI Bear Tracking: भालुओं की एक्टिविटी पर नजर रखने और डीएनए सैंपल जुटाने का तरीका पहले से ज्यादा आसान हो सकता है। रिसर्चर्स ने एक ऐसा एआई आधारित सिस्टम विकसित किया है, जो जंगलों में रहने वाले ब्राउन भालुओं के व्यवहार को ट्रैक करने के साथ-साथ यह भी पहचान सकेगा कि किसी जगह से डीएनए सैंपल मिलने की संभावना है या नहीं। माना जा रहा है कि यह तकनीक वन्य जीव संरक्षण और रिसर्च के क्षेत्र में बड़ी मदद साबित हो सकती है।
यह रिसर्च जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन की ओर से पब्लिश किया गया है। इसमें बताया गया है कि एआई की मदद से कैमरा ट्रैप में कैद तस्वीरों का विश्लेषण कर भालुओं की खास एक्टिविटी को पहचाना जा सकता है। खासतौर पर सिस्टम इस बात पर नजर रखता है कि भालू कब दौ पैरों खड़ा होता है, क्योंकि ऐसा व्यवहार अक्सर पेड़ों से शरीर रगड़ने के दौरान देखा जाता है। AI तकनीक के माध्यम से, रिसर्चर्स न केवल भालुओं के व्यवहार को समझने में सक्षम होंगे, बल्कि उनके संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठा सकेंगे।
कैसे जुटाए जाते हैं भालू के डीएनए सैंपल? वन्य जीव एक्सपर्ट्स लंबे समय से भालुओं के फर के जरिए डीएनए सैंपल इकट्ठा करते रहे हैं। इसके लिए पेड़ों पर कांटेदार तार लगाए जाते हैं, जिन्हें हेयर स्नेर कहा जाता है। जब भालू पेड़ से शरीर रगड़ता है तो उसके कुछ बाल तारों में फंस जाते हैं, जिन्हें बाद में डीएनए जांच के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इस प्रक्रिया में रिसर्चर्स को बार-बार इन जगहों पर जाकर सैंपल इकट्ठा करने पड़ते हैं, जिससे समय और संसाधनों की बहुत खर्च होती है। वहीं कई बार निरीक्षण के बावजूद उपयोगी सैंपल नहीं मिलते हैं।
एआई ने कैसे पहचाना भालुओं का व्यवहार? रिसर्चर्स ने 2020 से 2023 के बीच कैमरा ट्रैप से जुटाए गई 2,373 तस्वीरों का इस्तेमाल किया। चूंकि भालुओं की एक्टिविटी से जुड़ा कोई डेटासेट उपलब्ध नहीं था, इसलिए वैज्ञानिकों ने तस्वीरों में भालुओं के शरीर के 15 प्रमुख हिस्सों को मैन्युअल चिन्हित किया। इसके बाद YOLOv11 आधारित पोज एस्टिमेशन मॉडल को ट्रेन किया गया। यह मॉडल भालू के शरीर की स्थिति को पहचानने में 93.2 प्रतिशत तक सटीक साबित हुआ। वहीं एक अलग मशीन लर्निंग मॉडल ने भालुओं के दो पैरों पर खड़े होने और चार पैरों पर चलने जैसी मुद्राओं को 96.1 प्रतिशत सटीकता के साथ वर्गीकृत किया। यह मशीन लर्निंग की क्षमता को दर्शाता है, जो वन्य जीवों के अध्ययन में नया आयाम जोड़ता है।
दूर दराज के इलाकों में भी करेगा काम रिसर्चर्स के अनुसार, यह सिस्टम उन क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी है, जहां मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट कनेक्टिविटी बहुत सीमित होती है। आमतौर पर कैमरा टाइप की तस्वीरें भेजने के लिए काफी डेटा की जरूरत होती है, लेकिन एआई सिस्टम पूरी तस्वीर भेजने के बजाय केवल जरूरी पोज डेटा और सरल विजुअल जानकारी सैटेलाइट लिंक के जरिए ट्रांसफर कर सकता है। इससे डेटा ट्रांसफर का आकार कई मेगाबाइट से घटकर लगभग 100 बाइट तक रह जाता है, जिससे दूर के इलाकों में भी निगरानी आसान हो सकती है। इस प्रकार, AI तकनीक न केवल भालुओं के व्यवहार को ट्रैक करने में मदद करती है, बल्कि यह संरक्षण प्रयासों को भी सशक्त बनाती है।
भालू ट्रैकिंग के लिए AI आधारित इस नई तकनीक का विकास न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान को तेज करेगा, बल्कि यह संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जैसे-जैसे यह तकनीक विकसित होती जाएगी, यह अन्य वन्य जीवों के अध्ययन में भी अपनाई जा सकती है। वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में AI का उपयोग एक नया युग ला सकता है, जिससे न केवल भालुओं, बल्कि अन्य प्रजातियों के संरक्षण में भी मदद मिलेगी।
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